Monday, December 16, 2019

Vyanjan sandhi

                        व्यंजन संधि

व्यंजन संधि की परिभाषा :

व्यंजन संधि का उदाहरण :

परिभाषा :

व्यंजन संधि में व्यंजन के साथ स्वर या व्यंजन का मेल करने पर जो परिवर्तन होता है, वह व्यंजन संधि कहलाता है।

जैसे : जगत् + ईश = जगदीश

उपरोक्त दो शब्द 'जगत्' और 'ईश' में पहला शब्द 'जगत' का अंतिम वर्ण 'त्' है तथा दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण 'ई' दीर्घ स्वर है। दोनों के जुड़ने पर 'त' अपने वर्ग के तीसरे रूप में परिवर्तित होकर 'जगदीश' बन जाता है।

महत्वपूर्ण बिंदु :

व्यंजन संधि में अनेक प्रकार के नियमों का प्रयोग किया जाता है। इसे समझने से पूर्व स्पर्श व्यंजन के वर्गों की पुनरावृत्ति आवश्यक है।
हिंदी वर्णमाला में स्पर्श व्यंजनों की संख्या पच्चीस है। स्पर्श व्यंजन को पाँच वर्गों में बाँटा गया है। प्रत्येक वर्ग का भिन्न - भिन्न नाम है।

कवर्ग = क ख ग घ ङ
चवर्ग = च छ ज झ ञ
टवर्ग = ट ठ ड ढ ण
तवर्ग = त थ द ध न
पवर्ग = प फ ब भ म
उपरोक्त वर्ग पाँच स्पर्श व्यंजनों के समूह हैं। प्रत्येक वर्ग के नाम उनके प्रथम वर्ण के आधार पर है। 

जैसे :

कवर्ग में पाँच स्पर्श व्यंजन क, ख, ग, घ, ङ आते हैं।

व्यंजन संधि के नियम निम्नलिखित हैं।

1. स्पर्श व्यंजन के साथ स्वर का मेल करने पर स्पर्श व्यंजन अपने वर्ग के तीसरे अक्षर के रूप में परिवर्तित हो जाता है अर्थात क्, च्, ट्, त्, प् के साथ स्वर के योग का परिणाम  क्रमशः ग, ज, ड, द, ब होता है या क् 'ग' में, च् 'ज' में, ट् 'ड' में, त् 'द' में तथा प् 'ब' में बदल जाता है।

जैसे =
क् + स्वर = ग
च् + स्वर = ज
ट् + स्वर = ड
त् + स्वर = द
प् + स्वर = ब

उदाहरण :

अच् + अंत = अजंत
अप् + आदान = अबादान
उत् + अन्त = उदन्त
उत् + अग्र = उदग्र
उत् + अय = उदय
कृत् + अन्त = कृदन्त
चित् + आनंद = चिदानंद
जगत् + आनंद = जगदानंद
जगत् + आधार = जगदाधार
जगत् + गुरु = जगद्गुरु
तत् + अर्थ = तदर्थ
तत् + अनुसार = तदनुसार
तत् + आकार = तदाकार
तत् + आत्म = तदात्म
तत् + आत्मा = तदात्मा
दिक् + अंत = दिगंत
दिक् + अंबर = दिगम्बर
दिक् + अंचल = दिगंचल
वाक् + ईश = वागीश
षट् + आनंद = षडानंद
सत् + आचार = सदाचार
सत् + आनंद = सदानंद
सत् + इच्छा = सदिच्छा
सम् + उत् + आय = समुदाय

2. किसी भी ह्स्व स्वर या 'आ' को 'छ' से जोड़ने पर वहाँ 'च्' की उत्पत्ति होती है अर्थात दोनों के बीच 'च्' का प्रयोग किया जाता है।

उदाहरण :

आ + छादन = आच्छादन
अनु + छेद = अनुच्छेद
जग् + छाया = जगच्छाया
परि + छेद = परिच्छेद
वि + छेद = विच्छेद
वृक्ष् + छाया = वृच्छाया
शिव् + छाया = शिवच्छाया
संधि + छेद = संधिच्छेद
स्व् + छंद = स्वच्छंद

3. अ/आ रहित किसी भी स्वर के साथ 'स' का योग करने का परिणाम 'ष' होता है अर्थात 'स' का परिवर्तन 'ष' में होता है।

उदाहरण :

अभि + सेक = अभिषेक
वि + सम = विषम
सु + सुप्त = सुषुप्त

4. 'न' या 'म' को किसी भी स्वर से योग करने पर किसी तरह का कोई बदलाव नहीं होता है बल्कि 'न' या 'म' में स्वर की मात्रा का प्रयोग होता है।

उदाहरण :

अन् + अन्य = अनन्य
अन् + अंत = अनंत
अन् + आगत = अनागत
अन् + आहार = अनाहार
धन् + आलय = धनालय
भोजन् + आलय = भोजनालय
शयन् + आगार = शयनागार
स्नान् + आगार = स्नानागार
प्रेम् + आलाप = प्रेमालाप
सम् + आहार = समाहार

5. म' के साथ स्वर वर्ण का मेल करने पर 'म' उसी स्वर की मात्रा से अलंकृत हो जाता है।

उदाहरण :

सम् + ईक्षा = समीक्षा
6. इसमें व्यंजन वर्ण के साथ व्यंजन वर्ण का मेल होता है। इसमें स्पर्श व्यंजन वर्ग का पहला वर्ण क,च,ट,त,प संधि करने के उपरांत वह अपने वर्ग के तीसरे वर्ण ग,ज,ड,द,ब में परिवर्तित हो जाता है।

उदाहरण :

अप् + ज = अब्ज
अप् + धि = अब्धि
अप् + नदी = अब्नद
अप् + माधुर्व = अब्माधुर्व
अप् + हरण = अब्भरण
अच् + हरण = अज्झरण
अच् + हीन = अज्झीन
अच् + लुप्त = अज्लुप्त
उत् + अंक = उदंक
उत् + गम = उद्गम
उत् + गार = उद्गार
उत् + घोष = उद्घोष
उत्+ घाटन = उद्घाटन
उत् + दंड = उद्दंड
उत् + भव = उद्भव
उत् + भास = उद्भास
उत् + मूलित = उन्मूलित
उत् + मीलित = उन्मीलित
उत्+ याम = उद्याम
उत् + योग = उद्योग
उत् + वर्तन = उद्वर्तन
उत् + विग्न = उद्विग्न
उत् + वेग = उद्वेग
कच् + जल = कज्जल
तत् + भव = तद्भव
तत् + रूप = तद्रूप
दिक् + गज = दिग्गज
दिक् + दर्शन = दिग्दर्शन
दिक् + भ्रम = दिग्भ्रम
भगवत् + गीता = भगवद्गीता
भगवत् + भक्ति = भगवद्भक्ति
ऋक् + वेद = ऋग्वेद
वाक् + युद्ध = वाग्युद्ध
वाक् + दत्ता = वाग्दत्ता
षट् + दर्शन = षड्दर्शन
सत् + भावना = सद्भावना
सत् + काल = सद्काल
सत् + गति = सद्गति
सत् + वाणी = सदवाणी

7. वर्ग का पहला वर्ण क,च,ट,त,प को न/म से योग करने पर 'क्' का 'ङ', 'च्' का 'ञ', 'ट्' का 'ण', 'त्' का 'न' तथा 'प्' का 'म' हो जाता है।

उदाहरण :

अप् + मय = अम्मय
उत् + नति = उन्नति
उत् + नयन = उन्नयन
उत् + नायक = उन्नायक
उत् + मत्त = उन्मत्त
उत् + माद = उन्माद
उत् + मुख = उन्मुख
उत् + मूलन = उन्मूलन
चित् + मय = चिन्मय
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
जगत् + माता = जगन्माता
तत् + नाम = तन्नाम
तत् + मय = तन्मय
तत् + मात्र = तन्मात्र
तत् + मित्र = तन्मित्र
दिक् + नाग = दिङ्नाग
रुच् + मय = रुञ्मय
वाक् + मय = वाङ्मय
षट् + मास = षण्मास
षट् + मुख = षण्मय
सत् + नारी = सन्नारी
सत् + मति = सन्मति
सत् + मार्ग = सन्मार्ग

8. किसी शब्द का अंतिम वर्ण 'त्' होने पर तथा उसे च,ज,ट,ड या ल से संयुक्त करने पर 'त्' दूसरे शब्द के पहले वर्ण के रूप में ढल जाता है।

उदाहरण :

उत् + चारण = उच्चारण
उत् + ज्वल = उज्ज्वल
उत् + डयन = उड्डयन
उत् + लास = उल्लास
उत् + लंघन = उल्लंघन
उत् + लेख = उल्लेख
जगत् + जननी = जगज्जननी
तत् + लीन = तल्लीन
वृहत् + टीका = वृहट्टीका
सत् + चरित्र = सच्चरित्र
सत् + जन = सज्जन

9. 'त्' के साथ 'छ' का योग करने पर त् 'च्' में परिणत हो जाता है।

उदाहरण :

उत् + छिन्न = उच्छिन्न
जगत् + छाया = जगच्छाया

10. 'त्' को 'श' से संयुक्त करने पर दोनों मिलकर ( त्+श = च्छ) में परिवर्तित हो जाता है।

उदाहरण :

उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
उत् + श्वास = उच्छवास
उत् + श्रृंखल = उच्छृंखल
तत् + शिव = तच्छिव
सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र

11. 'त्' को 'ह' से जोड़ने पर दोनों युक्त होकर (त्+ह = द्ध) में बदल जाता है।

उदाहरण :

उत् + हार = उद्धार
उत् + हत = उद्धत
तत् + हित = तद्धित
पद् + हति = पद्धति

12. 'म' के साथ किसी भी स्पर्श व्यंजन का योग करने पर 'म' अपने ही वर्ग के पंचमाक्षर में रूपांतरित हो जाता है अर्थात 'क' का 'ङ', 'च' का 'ञ', 'ट' का 'ण', 'त' का 'न' तथा 'प' का 'म' हो जाता है। शब्द के अंत में अनुस्वार सदैव 'म' का ही रूप लेता है।

उदाहरण :

काम् + ति = कान्ति
किम् + कर = किङकर
किम् + चित = किंचित्
किम् + नर = किन्नर
गम् + तव्य = गंतव्य
परम् + तु = परन्तु
पम् + चम = पंचम
सम् + कर = शंकर
सम् + कलन = संकलन
शम् + का = शंका
सम् + कल्प = संकल्प
सम् + गत = संगत
सम् + गति = संगति
सम् + चय = संचय
सम् + चार = संचार 
सम् + जय = संजय
सम् + जीवन = संजीवन
सम् + तोष = संतोष
सम् + थाल = संथाल
सम् + देह = संदेह
सम् + गम = संगम
सम् + गठन = संगठन
सम् + कृति = संस्कृति
सम् + दीप = संदीप
सम् + ध्या = संध्या
सम् + बोधन = संबोधन
सम् + भव = संभव
सम् + भाषण = संभाषण
सम् + गीत = संगीत
सम् + ताप = संताप
सम् + धान = सन्धान
सम् + धि = संधि
सम् + बंध = संबंध
सम् + न्यासी = संन्यासी
सम् + कर्ता = संस्कर्ता
सम् + देश = संदेश
सम् + निहित = संनिहित
सम् + पूर्ण = सम्पूर्ण
सम् + बल = संबल

13. 'म्' को अंतस्थ या उष्म व्यंजन वर्ण य,र,ल,व,श,स,ह के साथ जोड़ने पर 'म्' अनुस्वार में परिवर्तित हो जाता है तथा 'म्' और 'र' के योग में किसी-किसी शब्द में 'म्' में पदेन का प्रयोग होता है।

जैसे = म् + र = म्र

उदाहरण :

सम् + योग = संयोग
सम् + यम = संयम
सम् + रक्षक = संरक्षक
सम् + रक्षण = संरक्षण
सम् + राट = सम्राट
सम् + लग्न = संलग्न
सम् + लाप = संलाप
सम् + लिप्त = संलिप्त
सम् + वत् = संवत्
सम् + वाद = संवाद
सम् + शय = संशय
सम् + साधन = संसाधन
सम् + स्मरण = संस्मरण
सम् + हार = संहार

14. 'म' को 'न' या 'म' से युक्त करने के उपरांत 'म' दूसरे शब्द के पहले वर्ण में रूपांतरित हो जाता है परंतु अनुस्वार का प्रयोग नहींं होता है।

उदाहरण :

सम् + निधि = सन्निधि
सम् + मति = सम्मति
सम् + मोहन = सम्मोहन

15. 'मंत्री' शब्द को 'मंडल' या 'परिषद' से जोड़ने के उपरांत 'त्र' की मात्रा ह्स्व से दीर्घ हो जाता है।

उदाहरण :

मंत्री + मंडल = मंत्रिमंडल
मंत्री + परिषद = मंत्रिपरिषद

16. 'र' को 'र' से मेल करते समय प्रथम वर्ण 'र' का लोप हो जाता है तथा पहले शब्द का ह्स्व स्वर, दीर्घ रूप में परिणत हो जाता है।

उदाहरण :

निर् + रस = नीरस
निर् + रोग = नीरोग

17. ऋ,र,रि,ष को 'न' से जोड़ने पर 'न' का परिवर्तन 'ण' में होता है अर्थात न, 'ण' में बदल जाता है। परंतु उसके बाद 'च' वर्ग, 'ट' वर्ग, 'त' वर्ग के वर्ण या 'श' तथा 'स' होने पर न, 'ण' में नहीं बदलता है।

उदाहरण :

परि + नाम = परिणाम
मर् + न =मरण
भूष् + अन = भूषण
शोष् + अन = शोषण

18. उष्म व्यंजन वर्ण श/ष के साथ 'त' या 'थ' का मेल करने पर त,थ क्रमशः ट,ठ में परिवर्तित होता है अर्थात त, 'ट' में तथा थ, 'ठ' में बदल जाता है।

उदाहरण :

क्लिश् + त = क्लिष्ट
आकृष् + त = आकृष्ट
कष् + त = कष्ट
द्रष् + ता = द्रष्टा
दुष् + त = दुष्ट
दुष् + तता = दुष्टता
भ्रष् + त = भ्रष्ट
शिष् + त = शिष्ट
शिष् + तता = शिष्टता

काष् + थ = काष्ठ
पृष् + थ = पृष्ठ
षष् + थ = षष्ठ

19. 'सम्' या 'परि' उपसर्ग के साथ 'कृ' धातु या उससे बना कोई शब्द को जोड़ने पर वहाँ 'स' या 'ष' की उत्पत्ति होती है।

उदाहरण :

सम् + करण = संस्करण
सम् + कार = संस्कार
सम् + कृत = संस्कृत
परि + कार = परिष्कार
परि + कृत = परिष्कृत








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